कविता-यूँ ही नहीं आई हूँ।
यूँ ही नही इस धरा पर,
जन्म लेकर आई हूँ।
साथ अपने हर सपने को,
साकार करने आई हूँ।
करना चाहती विचरण स्वच्छंद,
खूले नभ में परिंदो की तरह,
ऊंचाईयों को छूनें आई हूँ।
ज्यों होती कोमल कली
वैसी मैं थोड़ी-थोड़ी
कली की तरह खिलकर मैं,
सूगंध हर तरफ फैलाने आई हूँ।
यूँ ही नही इस धरा पर,
जन्म लेकर आई हूँ।
नई उमंग और नए हौसले,
अरमान जो थी अंदर मेरे,
अपने हर हूनर दिखाकर,
पहचान बनाने आई हूँ।
यूँ ही नहीं इस धरा पर ,
जन्म लेकर आई हूँ।
साथ अपने हर सपने को,
साकार करने आई हूँ।
🌷🌷🌷🌷🌷
©अनोखी दुनिया
जन्म लेकर आई हूँ।
साथ अपने हर सपने को,
साकार करने आई हूँ।
करना चाहती विचरण स्वच्छंद,
खूले नभ में परिंदो की तरह,
ऊंचाईयों को छूनें आई हूँ।
ज्यों होती कोमल कली
वैसी मैं थोड़ी-थोड़ी
कली की तरह खिलकर मैं,
सूगंध हर तरफ फैलाने आई हूँ।
यूँ ही नही इस धरा पर,
जन्म लेकर आई हूँ।
नई उमंग और नए हौसले,
अरमान जो थी अंदर मेरे,
अपने हर हूनर दिखाकर,
पहचान बनाने आई हूँ।
यूँ ही नहीं इस धरा पर ,
जन्म लेकर आई हूँ।
साथ अपने हर सपने को,
साकार करने आई हूँ।
🌷🌷🌷🌷🌷
©अनोखी दुनिया

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